हर उम्र एक जुदा आसमां लिए होती है
ज़िन्दगी का वो मोड़ जब बदलाव अपने शबाब पर होता है.. कई चीज़ें बड़ी रफ़्तार से बदलती हैं.. शायद जवानी ही है.. यही वो दौर होता है जब कितनी जल्दी चेहरे के रोयें, दाढ़ीकी शक्ल इख्तियार कर लेते हैं - पता ही नहीं चलता.. किस तरह ज़िदें, ज़िम्मेदारियां बन जाती...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
कुछ यूँ ही...
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[17 Sep 2009 04:47 AM]



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