हे अग्नि!
एकालापहे अग्नि!हे अग्नि!तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।बहुत क्षमता है तुममेंबड़ा ताप है - बड़ी जीवंतता।तुम जल में भी सुलगती होऔर वायु में भी,भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान होऔर व्यापती हो आकाश में भी तुम।हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम प्राण...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
कविता
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[02 Aug 2009 16:36 PM]



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