चांदनी में तूफान

मन हर रातज्वार आते रहते है,चांद फिर भी ठहराटुकुर-टुकुर देखताअपने कर्तव्य कीइतिश्री समझ लेता है,सुबह होने परचांदनी रात का छद्म अहसासदर्द बनकरसूरज की रोशनी मेंऔर भी बढ़ने लगता है,शायद तूफान का वक्तनजदीक आ रहा होता है।... [पूरी पोस्ट]
writer मिथिलेश श्रीवास्तव

कविता

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[25 Jul 2009 07:05 AM]

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