काव्यात्माओं का सृजनशील तांडव
उस शहर मेंमुझेमिली चंद काव्यात्माएंबौद्धिकता की स्वच्छ चादर में लिपटीछंद, अलंकार, रस की मर्मज्ञ,परिष्कृत भाषा केआदर्श प्रतिमानव्यक्त करते थे उनकेविचारों को,मेरे पल्ले पड़ा बहुत कमऔरों से पूछा-उन्हें 'अर्थ' समझ नहीं आया था''बड़े ही उच्च विचार हैंजल्दी...
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मिथिलेश श्रीवास्तव
कविता
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[26 Jul 2009 11:11 AM]



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