क्यूं बीता जाए बैरी सावन !
चैत्र बीतासमझ में आयाइश्क परवान चढ़ानकली होली के मराठी-बंगाली रंग में,बैसाख बीतासमझ में आयाचेचक के हजारों दानों की तरहझूठी मोहब्बत का महल भीझड़ गया,जेठ-आसाढ़ बह गयापसीने, गुस्से और आंसुओं की बाढ़ में,लेकिन अबबीता जा रहा है सावनऔर कुछ भीनहीं आ रहा समझ...
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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[01 Aug 2009 01:14 AM]



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