चाहे जान भले ही जाये ट्रेंरें रें... रें

अचपन..   पचपन           बचपन चाहे जान भले ही जाये ट्रेंरें रें... रें, रेंट्रेंयाँ ! यह कल की बात है । यानि 22 जुलाई बुधवार " चाहे जान भले ही जाये ट्रेंरें रें रें... " रिशि जी के यह नारा लगाने का सिलसिला लगातार कुछ देर से चल रहा था । इधर मैं मजदूरों को कल का काम समझा रहा... [पूरी पोस्ट]
writer डा. अमर कुमार

तुम्हें मालूम है..

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[24 Jul 2009 02:38 AM]

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