जुगनुओं के शहर से एक और ख़त

Writer at Large इक अजनबी है अजनबी शहर को आ गयाहोटल जो लौटा तो लगा कि घर को आ गयातन्हाई से मिलना हुआ कितने बरस के बादकमबख्त को करते रहे कितना तरस के यादकितने ये चेहरे ओढ़ के दिल्ली में खो गयीख़त लिक्खे, पुकारा किये, खामोश हो गयीइक छोटे से शहर में है शरमा के फिर मिली"कैसे... [पूरी पोस्ट]
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[26 Aug 2009 22:29 PM]

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