स्विट्जरलैंड में सपनीले दिन......भाग १
" अपटु विधाता जो धुनता रहा ...बादल थे या रुई के फाहे ,पारदर्शी फर्श पर गगन के धुन-धुन कर बिखराता रहा....हर तार की तन-तन झंकार पर बूँदें रही जनमती श्वेत फाहों के बीच ,मौसम और कलसा गया........" इसे गद्य कहूँ या पद्य ...............स्विट्जरलैंड के द्वितीय...
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swati
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[12 Aug 2009 13:26 PM]



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