छवि....!
इस दुनिया कीजो छवि है मेरे भीतरउसमें एक स्त्री के वक्ष की तरहथामे हुए हैं उसेनन्हे शिशु हाथ।=====================प्रेम रंजन अनिमेष की पंक्तियाँ साभार....
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Dr. Chandra Kumar Jain
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[03 Sep 2009 23:37 PM]



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