ज़ोरे क़लम का अंदाजा...!

डॉ. चन्द्रकुमार जैन नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ाबिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ाअमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ागुज़र रही है जो मुझ पर किसी को क्या मालूम जो ज़ख्म उसने दिए थे हैं आज तक ताज़ा गुरेज़ करते हैं सब उसकी मेज़बानी से भुगत... [पूरी पोस्ट]
writer Dr. Chandra Kumar Jain
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[08 Sep 2009 09:51 AM]

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