रिश्तें नाते

तलाश रिश्तें रिश्तों के धागे उधड़ने लगे हैंना जाने कैसे रिश्तें बनने लगे हैं।खेले थे जिनकी गौद में कभीअब वही भारी होने लगे है।सोचा था बुढ़ापे में मिल जाऐगी दो रोटीअब तो रोटी के साथ ताने भी मिलने लगे हैं।कैसी अजब समय की घड़ी हैपैसे रिश्तों को सीँचने लगे है।कल... [पूरी पोस्ट]
writer सुशील कुमार छौक्कर

सुशील छौक्कर

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[19 Sep 2009 13:26 PM]

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