ग़ज़ल - मैं तो जिंदा हूँ मुहब्बत के लिए
मैं तो जिंदा हूँ मुहब्बत के लिएइक् फकत उसकी इबादत के लिएपहले रिश्तों की ज़रूरत थी हमेंआज रिश्ते हैं ज़रूरत के लिएसर उठाता हूँ ये है मेरी अनासर झुकाता हूँ इबादत के लिएमेरी बदनामी का आलम तो ये हैजाना जाता हूँ शराफत के लिएये बलायें क्या बिगाडेंगी मेराहै खुदा...
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kavideepakgupta
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[09 Aug 2009 06:36 AM]



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