सौ दिन के करिश्मे का कुछ होश करो साहब ?
ग़ज़लये कैसा उजाला है, ये कैसी दिवाली है.सब्जी भी हुई गायब, खाली मेरी थाली है.हमने तो कटोरी में डुबकी को लगा देखा,है दाल बहुत मँहगी और जेब भी खाली है.सौ-दिन के करिश्मे का कुछ होश करो साहब,सूरत तो बहुत भोली, पर चाल निराली है.लोगों की लुगाई ने, घर ऐसे...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[03 Sep 2009 09:55 AM]



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