उलझा-उलझा है भाषाई परिदृश्य

Jog Likhee फेसबुक के अपने मित्र सुयश सुप्रभ के ब्लॉग अनुवाद, हिंदी और भाषाओं की दुनिया पर उनका विचारोत्तेजक लेख क्या हम दुनिया की आधी भाषाओं को दम तोड़ते देखते रहेंगे तो लगभग् इसी विषय पर लिखा अपना एक थोड़ा पुराना लेख मुझे याद आ गया, जो अब भी प्रासंगिक है.18 मई... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

भाषा

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[10 Sep 2009 08:22 AM]

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