खस्सी आ चिकबा (लघुकथा) - सुभाष चंद्र

कतेक रास बात एकटा छागर छल, जकरा शुरूए सँ चिकबा पोसि रहल छल। खूब नीक जेकां रहैत छल छागर। चिकबा खूब ध्यान दैत छलै ओहि छागर पर। चिंतित रहैत छल छागरक प्रति। छागर कतओ इम्हर-ओम्हर नहि चलि जाय , कतओ रस्ता नहि बिसारि जाय, कतओ भुलता नहि जाय। हरियर-हरियर घास, कटहरक हरियर पात,... [पूरी पोस्ट]
writer सम्पादक: कतेक रास बात
views
6
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[24 Jul 2009 10:08 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix