एक शाम के नाम
सूरज का रथ लालिमा ले कर ,निकल पड़ा था क्षितिज की ओर !विशाल समुद्र के सपाट हृदय पर ,उठ रहा था लहरों का शोर !कलरव करते पक्षी भी अब,ढूंढ रहे थे रैन बसेरा !वहीँ दूर एक खड़ी थी किश्ती ,जाने को अब घर की ओर !सफ़ेद चमकती रेत पर बैठी ,सोच रही थी मैं एक बात !क्यूँ न...
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शिवानी
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[29 Aug 2009 06:27 AM]



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