‘हिन्दी का श्राद्ध’
मैं अतिथि कक्ष में सोफे पर बैठ कर कुछ लिख रहा था कि तभी दरवाज़े पर कॉल बेल की आवाज़ सुनाई दी दरवाज़ा खोला तो देखा कि इष्टदेव जी जो मेरे मित्र हैं और जिनका सिर घुटा हुआ है, दरवाज़े पर खड़े हैं। मैने प्रश्न किया कि क्या हुआ? सब कुशल है न? सिर क्यों घुटा रखा है?...
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विनय ओझा 'स्नेहिल'
व्यंग्य
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[11 Sep 2009 06:40 AM]



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