ऐ गमे दिल क्या करूं

उम्मीद है बाजार में अब क्या क्या बिकना बचा है। मामला निजता की नीलामी तक जा पहुंचा है। आज से पंद्रह साल पहले हम ग्लोबलाइजेशन और बाजारीकरण के नफे नुकसान के सेमिनारों में हिस्सा लिया करता थे। राम पुनियानी से लेकर कश्यप जी जैसे बड़े बडे धुरंधरों के लेक्चर सुना करते... [पूरी पोस्ट]
writer सुबोध
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[13 Aug 2009 02:57 AM]

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