मरीचिका

जो देखा भूलने से पहले गहराती शाम की तंद्रा टूटतीकिलकारी लेती अबाबील लगाती गोता छत की मुंडेर में,छापा जाता है पैसे को मशीनों सेकागज पर लिखा मूल्य तय करता हैसड़क पर अस्मितातय करता है आवश्यकता,महत्व केवल मूल्य के विचार भर से हीऔर सच्चाई जैसे कोई स्मृति!रेत और पानी में छुपी है... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन राणा - Mohan Rana
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[10 Sep 2009 18:52 PM]

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