मोहब्बत

प्रत्यक्षा उसकी आवाज़ कूँये में गिरते छोटे पत्थरों जैसी थी । हर शब्द के बाद एक चुप्पी का छोटा तालाब जिसमें शब्द की अनुगूँज सुनाई दे । दबी कसक में लिपटी जाने कहां से अचानक उस बचपन की याद हो आई जब हम घर के पीछे पोखरे पर कितनी शामें कमीज़ और निकर में , घुटने छिलाये ,... [पूरी पोस्ट]
writer Pratyaksha
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[02 Aug 2009 08:27 AM]

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