गली के पीछे
कौन सा पुराना बाजा बजता है , पता नहीं पर रात बीतते नस पर चढ़ता है दर्द , और कोई धीमे से पूछता है , डर तो नहीं लग रहा ? तिरती खामोशी में खुद की साँस का शोर बेशर्म बेढपपने में छूटता गिरता है । एक सुबुक सिसकी दम तोड़ती है , हँसी फुसफुसाती है दबी शैतानी में और...
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Pratyaksha
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[21 Aug 2009 12:42 PM]



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