खोई हुई डायरियां नहीं मिलतीं... प्रेमिकाओं की तरह
डायरी नई है... किसी बात को कई हफ्ते बीत चुके हैं... किसी बात को शुरू होने में कई दिन हैं... हर लम्हा एक वक्त पुराना हो रहा है... अगला छण हर पल नया होना चाहता है... ऐसे में एक नई डायरी हाथ लगी है... कुछ लिखना चाहता हूं... काली स्याही से लिखूं... मेरी बात...
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
यादें
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[27 Aug 2009 10:27 AM]



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