मैं तेरा, तेरी दुनिया का
अंगडाई लेते मेरे मैले ख्वाबों को तूने छू लिया था हौले से...जैसे पहले चुंबन सा स्पर्श था वो...और मैं जी लिया था ज़िंदगी मेरी...वो मोतियों की दुनिया थी...हकीकत में ख्वाबों की दुनिया...आंखों से झरती थी...और गर्म पानी का फव्वारा बुझाता था उस शहर की प्यासमैं...
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
यादें
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[02 Sep 2009 23:33 PM]



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