इंसानियत को नंगा किया ||
एक बार ऐसा हुआ था गुजरात में |दो सांड निकले थे एक बार रात में |ख़ामोशी जहां पसरी हुई पड़ी थी |क़त्ल की रात मुह बाए खड़ी थी||दोनों एक दुसरे से थे भयभीत |कौमी एकता की टूट चुकी थी प्रीत| |भयभीत दोनों, चल तो रहे थे एक साथ |पर चाहते हुए भी ना कर पा रहे थे बात...
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खुला सांड
कौमी दंगे
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[03 Dec 2009 02:24 AM]



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