पुल टूटे तो परवा किसको डाली है रेती थोडा माल

प्रकाश पाखी जब तू बीता पिछला साल दुबले रह गए अपने हाल जनता ढूंढें मिले न दाल मोटो को फिर मोटा माल इंसाफी में फिर फिर देरी काले कोट को रंग गुलाल दूर देश के बैंक भले हैं काला पैसा उसमे डाल सारे गुंडे शागिर्दों ने निर्वाचन में ठोकी ताल चुनना तो इक मजबूरी है पांच बर... [पूरी पोस्ट]
writer प्रकाश पाखी
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[30 Dec 2009 23:27 PM]

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