वर्ष प्रस्थान
झर गये पत्र सब पेड़ की शाख से तीन सौ साठ के सँग रहे पाँच वे कुछ हरे,पीत कुछ, कुछ थे सूखे हुए पारदर्शी रहे ज्यों बने काँच के कुछ किरण स्वर्ण से थी नहाई हुई और कुछ ओढ़ कर चाँदनी को मिली कुछ चलीं गांव को छोड़ कर, राह में थी भटकती रहीं मंज़िलें न मिली स्वप्न...
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राकेश खंडेलवाल
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[30 Dec 2009 20:44 PM]



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