चुल-बुल, बुल-बुल... बुल-बुल, चुल-बुल . . . . . . . . . . प्रवीण शाह.
गुजर रहा था शहर के एक पुराने मौहल्ले से, देखा एक जगह गली सजी है... बहुत से फूल बिखरे हैं...रात बारात आई थी यहां... सुबह शायद किसी बिटिया की विदाई हुई है... अचानक नजर पड़ी एक किनारे पड़े मुड़े-तुड़े कागज पर...कोई खत सा लगता था...उत्सुकता बढ़ी... चुपके...
[पूरी पोस्ट]
प्रवीण शाह
37
5
0
5
10
[30 Dec 2009 08:03 AM]



Shuffle








