क्या पता वह प्यार था
ज़िन्दगी मचली उमंगों का उठा इक ज्वार था; क्या पता वह वासना थी क्या पता वह प्यार था। याद बस दिन का निकलना और ढलना रात का, कल्पनाओं के महल थे स्वप्न का संसार था। होंठ पर मुस्कान सी थी आँख में पिघली नमी, प्यार की प्रस्तावना थी या कि उपसंहार था। स्वप्न म...
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chandrabhan bhardwaj
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[30 Dec 2009 03:12 AM]



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