ठूँठ में बदल गए

Chashmebaddoor कुछ बंद दरवाजे हैं कुछ रोज़ सुनी जाने वाली आवाज़ें दीवारें हैं, और बहुत कुछ है बिखरा हुआ जिसे रोज़ समेटती हूँ बस यही तो करती हूँ अपनी ज़िन्दगियों को “हमारी” बनाने की कोशिश में जितनी बार मुँह खोलती बाँहें फैलाती उतनी बार नासमझ करार दी जाती उलटबाँसियों... [पूरी पोस्ट]
writer अपराजिता
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[30 Dec 2009 00:48 AM]

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