अंतिम दिन

जो देखा भूलने से पहले भीगती शाम ठिठुरती सर्द पानी में दरवाजे के बाहर ही है अब नया साल समय को बाँचता दस्तक देने से पहले कुछ छुट्टे पैसे ही बचे हैं उसकी जेब में ये कुछ दिन, जिनमें ना आशा है ना उदासी वे ना जिंदा हैं ना अचेत बस एक बेचैन धड़कन अगर मैं उन्हें चूम लूँ तो एक ही ड... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन राणा - Mohan Rana
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[29 Dec 2009 17:34 PM]

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