बिछोह से खुलते हैं मोह के नए मानी
पतझर पील़ा पड़ गया पत्ता झरने को है वृक्ष से समय - समुद्र में विलीन होने को विकल है एक बूँद। बीते वक्त पर खीझना भी है रीझना भी ऐसे ही चलना है जीवन को सोचें क्या किया ? करना है क्या ? पढ़ना है पुराने हर्फ निकालना है नये अर्थ नई इबारतों से भरना है नए साल...
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sidheshwer
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[29 Dec 2009 07:22 AM]



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