गजल

Creative Kona धूप के छौने भी अब तो ठंढ से शर्मा रहे आग से दहके थे उपवन राख बनते जा रहे। स्याह चादर में लिपटते शब्द ढलते जा रहे गीत के मुखड़े निकल कर धुंध बनते जा रहे। बंद मुट्ठी से फ़िसल कर छंद निकले जा रहे शीत के पहरे में बैठे हम तो बस बल खा रहे। मौन पसरा गांव में... [पूरी पोस्ट]
writer creativekona
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[29 Dec 2009 07:19 AM]

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