सिर्फ आज जिया है!
विदा गुजरे साल को सब दे रहे हैं। गुजर रहे हैं साल-दर-साल सिर्फ रात औ' दिन के चक्र में न कल देखा, न देखेंगे। सिर्फ आज औ' आज अपना है। और इसी आज को जी सकते हैं। कुछ बदला है तो वक़्त के हिसाब से कलैंडर और तारीख बदलती है। तस्वीरे पुरानी और धुंधली होती हैं।...
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रेखा श्रीवास्तव
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[29 Dec 2009 03:32 AM]



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