सोमनाथ दादा, यह मौक़ापरस्ती नहीं तो क्या है!

मेरा मत अपनी पार्टी की ओर लाख समझाने के बावजूद सोमनाथ चटर्जी के स्पीकर पद न छोड़ने को आजकल काफ़ी महिमामंडित किया जा रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि भारतीय लोकतंत्र और संसदीय परंपराओं की रक्षा के लिए उन्होंने पार्टी से बर्ख़ास्तगी का सामना करके बहुत बड़ी... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभाष कुमार झा
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[28 Jul 2008 09:36 AM]

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