पसंद-नापसंद का संकुचित नजरिया क्यों?
मेरे करीबी दोस्तों की राय है कि मैं बोलते समय भविष्य की 'आशंकाओं और संभावनाओं' को ध्यान में नहीं रखता। अक्सर वे इसका अहसास भी दिलाते हैं, लेकिन मैं हमेशा से कहता हूं कि इतने किंतु-परंतु के साथ मैं नहीं जी सकता। बेलौस और बेलाग मेरा अंदाज है, इसे छोड़...
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प्रभाष कुमार झा
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[28 Apr 2009 03:37 AM]



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