सृजन का दर्द

ज़रिया-नज़रिया अजब सी छटपटाहट, घुटन,कसकन ,है असह पीड़ा समझ लो साधना की अवधि पूरी है। अरे घबरा न मन चुपचाप सहता जा सृजन में दर्द का होना जरूरी है। ये घुटन, कसकती पीड़ा, हलचल बेचैनी मां सृजन के लिये क्या ढोती है कुछ ऐसा ही एहसास धरा को होता है जब नई जिन्दगी आने वाली हो... [पूरी पोस्ट]
writer कन्हैयालाल नंदन
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[15 Aug 2008 12:35 PM]

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