दायरों से निकालना चाहती हूँ --
रिश्तों के दायरे में सिमटती मानवता को दायरों से निकालना चाहती हूँ क्योंकि -- मैं जानती हूँ कि एक दिन ऐसी सीमाओं में कदम-दर-कदम की बाधाओं में गुब्बारे की बंद हवाओं की तरह भीतरी परिवेश से कुछ नया करने का आवेश सड़ जाएगा मानवता का भाव कहीं रूंध जाएगा...
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USHA GAUR
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[21 Jun 2009 14:27 PM]



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