विदाई
विदाई " क्या सुनाऊ मैं तुम्हें ये दास्ताँ अपनी , यह है मेरी जुबानी एक कहानी अपनी ! मैं एक कली थी , जो एक बाग़ में खिली थी ! मेरे चेहरे पर एक अधखिली मुस्कान थी , जिसकी गवाह ये धरती और ये फिजां थी ! बाग़ के माली ने बड़े प्यार से संवारा था मुझे , आंधी औ...
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sonal
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[21 Apr 2009 13:44 PM]



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