ये सिर्फ़ एक शहर नहीं ; इंसानियत की आवाज़ है !
झुलस रहा मेरा शहर कोई चाह रहा है करो इसे बंद कोई चाह रहा है खुला रहे ये ग़रीब कुलबुला रहा है महंगाई में अमीर मना रहा है पिकनिक उसे मिल गया है सप्ताहांत का एक बहाना केसरिया ने कहा करो बंद हरा कहेगा अब करो बंद रंगो में बटा मेरा शहर अमन पसंद है इसकी तहज़ी...
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इन्दौरनामा
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[03 Jul 2008 16:14 PM]



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