इस मीठे शहर में…सदभाव हो रोशन
सदभाव था रोशन इस मीठे शहर में ये कौन यहॉं बो गया दुःख-दर्द के रोपे कौन इसे दे गया नफ़रत के ये तोहफ़े फूटे अब करुणा की नदी इसकी नज़र से अब और नहीं रोना इसे मनहूस ख़बर से ये व़क़्त है आओ मिलजुल के विचारें शांति से चलो आज हमदर्दी उचारें ग़ालिब की ग़ज़ल तुलसी की...
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इन्दौरनामा
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[08 Jul 2008 10:31 AM]



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