chakra
चाक पर टपका पसीना, माटी गीली हो गई. लाज का दीया गढ़ने में वो नीली-पीली हो गई. ख्वाब के गढ़हों में घुसी आँखें, पर नम नहीं, पेट कुछ भी कराए, वरना खूबसूरत कम नहीं. वक़्त क़ी गुल्लक में भरती थी लम्हों के चिल्लर दिन बिताती खुशियाँ खोज, रातें दर्द काटकर. फ...
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durgesh
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[03 Apr 2009 11:17 AM]



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