सुबह
कई बार नयी सुबह की प्रतीच्छा करते रह जाते हैं हम घोर अंधियारे में नहीं सूझता किस दिशा में है सही राह। अंधेरे में ठोकर खाते उलझते - गिरते उलझाते - गिराते बढ़ते जाते हैं हम। सच - अंधेरा घना, औ आंख में टंगे रूपहले ख्वाब बदरंग दुनिया के स्याह रंग इतने मो...
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kamlesh
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[29 Jun 2009 09:24 AM]



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