मित्र

kamlesh pandey मित्रता दिवस पर विशेष) मित्र अंधेरे में साथी जब सूझती नहीं है राह भय से लरजते कांपते हैं पैर सामने घना अंधेरा राह अदृश्य। सामने कौन- कैसा पहचानना मुश्किल। वाकई घना है अंधेरा, दिन के उजाले में भी पहचानना मुश्किल कई बार अपने तक को ? चेहरे की लकीरें ढंक... [पूरी पोस्ट]
writer kamlesh
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[30 Jul 2009 08:49 AM]

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