सपने
मैं थोड़े सपने बोता हूं थोड़े सपने बांटता हूं बिना सपनों के मुझे अपने होने पर ही शक होता है नहीं जानता बिन सपनों के आदमी कैसे होता है ? थोड़े- बहुत बचे हैं पास अपने उन्हें सजोने उन्हें बढ़ाने मैं बोता सपने बांटता थोड़े सपने। बंधु गर अब भी बचे हों तुम...
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kamlesh
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[31 Jul 2009 10:32 AM]



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