थामो हाथ
बहुत चहक कर मैंने बढ़ाये हैं तुम्हारी ओर हाथ। इस भीड़ में भी अकेले हैं कितने हमारे कदम नहीं मिलते कभी एक साथ एक जैसे पदचाप। हर कदम की अपनी अलग राह अनजान मंजिलों सुनसान डगर मापते थके पांव चलने को मजबूर हम-तुम कब तक ? बागीचों पर आज पहरा है हवाएं भी बंग...
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kamlesh
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[05 Aug 2009 10:33 AM]



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