थामो हाथ

kamlesh pandey बहुत चहक कर मैंने बढ़ाये हैं तुम्हारी ओर हाथ। इस भीड़ में भी अकेले हैं कितने हमारे कदम नहीं मिलते कभी एक साथ एक जैसे पदचाप। हर कदम की अपनी अलग राह अनजान मंजिलों सुनसान डगर मापते थके पांव चलने को मजबूर हम-तुम कब तक ? बागीचों पर आज पहरा है हवाएं भी बंग... [पूरी पोस्ट]
writer kamlesh
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[05 Aug 2009 10:33 AM]

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