इंतजार
है मुझे इंतजार कब होगी नयी सुबह जब फूलों के बीच बच्चे हंसते- कूदते- खेलते दौड़ते दिखेंगे उनकी पीठों पर नहीं होगा भारी बोझ, निरर्थक शब्दों का गठ्ठर। शब्द- वाकई असमर्थ नहीं बदल पाते हैं भाव- समाज- दुनिया। अंधेरा छाया है घना मन व रिश्तों में दिखती नहीं...
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kamlesh
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[08 Aug 2009 09:02 AM]



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