युवा मन

kamlesh pandey कई बार मैंने पाया मन काफी पहले बूढ़ा हो गया छुटपन में पीठ पर लाद दिये गये शब्दों के बोझ अब तक नहीं उतार पाया। बेजान पत्थर बन चुके शब्द भार स्वरूप कब तक ढोऊं उन्हें अकेले साथ बंटाने नहीं कोई हाथ लंबी डगर- अकेला सफर, औ सिर पर अगिया वैताल से नाचते शब्द... [पूरी पोस्ट]
writer kamlesh
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[17 Aug 2009 10:26 AM]

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