युवा मन
कई बार मैंने पाया मन काफी पहले बूढ़ा हो गया छुटपन में पीठ पर लाद दिये गये शब्दों के बोझ अब तक नहीं उतार पाया। बेजान पत्थर बन चुके शब्द भार स्वरूप कब तक ढोऊं उन्हें अकेले साथ बंटाने नहीं कोई हाथ लंबी डगर- अकेला सफर, औ सिर पर अगिया वैताल से नाचते शब्द...
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kamlesh
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[17 Aug 2009 10:26 AM]



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