कंक्रीट का जंगल

kamlesh pandey छोटे से ताल में उतरे हैं धवल पाखी कंक्रीट के इस जंगल में। धड़के हैं हौले से कुछ शब्द किसी के सीने में सफेद पन्नों पर उतर आये हैं रक्ताभ, उष्मित शब्द। कविता बनती है पढ़ी, गुनी जाती भुला- बिसरा दी जाती है। नित्य पंख पसार उड़ते आते हैं श्वेत श्याम पाखी... [पूरी पोस्ट]
writer kamlesh
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[04 Sep 2009 10:26 AM]

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