टैगोर की शतवर्षीय काव्यदॄष्टि
गुरुदेव रविन्द्रनाथ की इस सुन्दर रचना के सुखद आंनद का स्पर्श हमारी तरह आप भी करिये- कौन हो तुम,सौ बरस बाद मेरी कवितायें पढ़ रहे हो? जहां मैं हूं, यहां के स्वर्गिक वसंत से एक फ़ूल भी तो तुम्हें भेज नही सकता! बादलों के परे से मैं एक स्वर्ण-रेख भी तुम्हे...
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संगीता-जीवन सफ़र
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[10 Nov 2008 14:24 PM]



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