घर कब आओगे
सुनो मेरी दास्तां , समझो सियासी चालें... दंगे में वीरान हो चुके गुलाबगंज की जो दास्तां आपको सुनाई थी...आज दिखाने जा रही हूँ। हर बार दंगों के बाद ऐसा ही होता है..कुछ मुहल्ले बेनूर होते हैं लेकिन राजनेताओँ के चेहरे से नूर टपकता है। नूर वोटों की ताजी फस...
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श्रुति अग्रवाल
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[15 Oct 2008 08:06 AM]



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